पंजाब की सोंधी महक से भरपूर, कोहरा के पहले सीजन की तरह ही यह Kohrra Season 2, एक बार पुन: उसी पंजाबी सुगंध से परिपूर्ण एक नई क्राइम थ्रिलर कहानी लेकर प्रस्तुत हुआ है, जिसका पिछले सीजन की कहानी से कोई लेना देना नहीं है.बंधुआ मजदूरी के दंश से परिचित कराती यह सीरीज एक ऐसी भयावह वास्तविकता को समाज के सामने लाती है जिसे अब समाप्त प्राय: मान लिया गया है.
एक विचित्र हथियार से हुई हत्त्या के साथ शुरु, लगभग पांच घंटे में फैला, 6 एपिसोड में वर्णित कथानक और रहस्य की परतें खोलता यह सीजन, कलाकारों के जबरदस्त अभिनय के कारण दर्शनीय बन पड़ा है.
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कहानी
जाड़े की भीषण ठंड में कोहरे की चादर में लिपटे वातावरण मे, एक स्त्री की भैंस के बाड़े मे, कृषि औजार से हुई हत्त्या की जांच मे लगी,पुलिस टीम का नेत्रत्व कर रही मोना सिंह, अपने सहकर्मी वरुण सोबती के साथ जांच शुरु करती है. शक उस स्त्री के बड़े भाई , उसके पति, उसके डांस पार्टनर आदि अनेक लोगों पर जाता है. हर एक के पास, उसके कत्ल के कारण हैं, जिनकी छान बीन पुलिस करती है. इसी बीच एक घर में लगी आग में, कुछ लोग जिंदा जल जाते हैं. यह मामला भी इन्हीं पुलिस कर्मियों के कार्य क्षेत्र में आने के कारण, उसकी भी जांच शुरु होती है. इस बीच झार खंड से आया, एक लड़का, अपने माँ बाप की फोटो लिए,बीस वर्ष पूर्व यहाँ पंजाब आए, अपने पिता को ढूंढ रहा है. पुलिस धीरे धीरे रहस्य की सभी परतों को खोल, एक पेचीदा केस को कैसे साल्व करती है, यह देखने योग्य बन पड़ा है.

अभिनय
मोना सिंह मुख्य जांचकर्ता पुलिस अधिकारी की भूमिका में जान डाल देती हैं. पुरुष प्रधान क्षेत्र में, एक स्त्री को कार्य करने मे कितने तरीके के व्यवधान आते हैं और उन सब से निबटते हुए, वह कैसे अपनी ड्यूटी को इमान्दारी से अंजाम देती है इस विवशता को बेहद कुशलता से मोना सिंह ने प्रस्तुत किया है.उनके सहयोगी के रूप में वरुण सोबती, पिछले कोहरा की तरह ही इस बार भी महफ़िल लूट ले जाते हैं. ऑफिस और घर की परेशानी से दो चार होते पुलिस कर्मी के द्वंद को अपनी ठहराव भरी अदायगी से उन्होंने बेमिसाल बना दिया है. अन्य सभी कलाकारों अनुराग अरोड़ा ( बड़े भाई) , रणविजय सिंह ( पति) , विख्यात गुलाटी ( जॉनी मलंग) आदि सभी ने अपनी अपनी भूमिका बहुत अच्छे से निभाई है लेकिन बीस साल बाद, पिता को ढूंढने आए युवक के रूप में ,अपने हाव भाव, भाव भंगिमा और चेहरे पर आने वाले भाव से विवशता, दुःख और पीड़ा को सहज ही प्रदर्शित करते युवा के रूप में प्रायार्क मेहता अंत तक याद रह जाते हैं. हालांकि, जयदीप अहलावत जैसे वरिष्ठ लोकप्रिय कलाकर की एक झलक दिखती है, उनको इतने छोटे रोल में दिखा कर क्यों उनकी प्रतिभा को जाया किया गया, पता नहीं.
मुख्य आकर्षण
बंधुआ मजदूर, सामंती सोच, नशा खोरी, पितृ सत्ता त्मक सामाजिक ढांचा और स्त्री को कमतर आंकने की पुरुष सोच को उजागर करती यह एक बेहतरीन वेब सीरीज है. इस सीरीज में, पुलिस कर्मी दक्षिण भारत की फ़िल्मों की तरह अनेक खलनायकों को एक साथ पटकनी देते नायक/ नायिका नहीं है, बल्कि जमीनी हकीकत से दो चार करते सामान्य पुलिस वाले हैं जो एक दुर्दांत हत्यारे से लडाई में अच्छी खासी चोट खा जाते हैं. उनका पहनावा शरीर से चिपके बदन दिखाऊ वस्त्र नहीं बल्कि उनकी आयु अनुसार ढीले ढाले लेकिन पूरे शरीर को ढंके हुए हैं. पूरी सीरीज में , संभावनाओं के रहने के बावजूद आपतिजनक अंग प्रदर्शन से बचा गया है.मुख्य कहानी के साथ साथ, हर एक व्यक्ति की अलग अलग समस्या, परेशानी और मानसिक द्वंद को बेहतर ढंग से सामने लाया गया है
कमियाँ
एक क्राइम थ्रिलर वेब सीरीज होने के बावजूद स्क्रीन प्ले की गति धीमी है. हर व्यक्ति, अपने विवाहेतर संबंध के कारण परेशान है लेकिन उसे सामान्य रूप में लिया गया है. परिवार के लोगों मे इसे लेकर कोई शर्मिंदगी या पछतावा नहीं है और न ही कोई इसकी भर्त्सना कर रहा है इसे सामान्य बात की तरह प्रदर्शित किया गया है जो समाज को गलत संदेश देता है. पुलिस की बड़ी अधिकारी होने के बाबजूद अपने पति को मोना सिंह , कई दिनों तक खोज नहीं पाती, यह बात अटपटी लगती है.
सारांश
कुल मिलाकर, कोहरा का दूसरा सीजन, पंजाब के माहौल, वातावरण, समस्याओं को दर्शाता एक दर्शनीय वेब सीरीज के रूप में सामने है,जिसे परिवार के साथ देखा जा सकता है
